ओशो ने किया विराट सत्संग का आयोजन


अध्यात्म की क्या आवश्यक है?
नई दिल्ली, (नरेन्द्र): तालकटोरा स्टेडियम में विराट सत्संग  का आयोजन किया गया। इस विषय पर अपने संबोधन में ओशो सिद्धार्थजी ने कहा कि अध्यात्म का अर्थ है-अपनी चेतना के स्वभाव को जानना। उन्होंने कहा कि भोग का मार्ग कहीं भी नहीं ले जाता क्योंकि सुख का स्रोत हमारी आत्मा है और उससे जुड़कर ही जीवन को उत्सव और आनन्दमय बनाया जा सकता है। ओशो सिद्धार्थजी ने, जिन्हें साधक बड़े बाबा कहते हैं, गीता को जीवन से जुड़ी सबसे उत्तम पुस्तक बताया। ऊर्जा-चक्रों की गहन व्याख्या करते हुए उन्होंने समझाया कि किन चक्रों की सक्रियता के कौन-कौन से तीन प्रमुख लाभ हैं और कैसे उन सबके समेकित लाभ के लिए व्यक्ति का आध्यात्मिक होना ज़रुरी है।


कार्यक्रम के दूसरे चरण में ओशो के अनुज डॉ. शैलेन्द्र शेखरजी ने, जिन्हें साधक छोटे बाबा के नाम से जानते हैं, सभागार में उपस्थित श्रोताओं के धर्म और जीवन विषयक प्रश्नों के रोचक उत्तरों से मंत्रमुग्ध दिया। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि राजनीति दूसरों का परिवर्तन करती है जबकि अध्यात्म का अर्थ है-स्वयं का परिवर्तन करना। यह पूछे जाने पर कि जीवन के लिए अध्यात्म की क्या आवश्यकता है,उन्होंने कहा कि भौतिक वस्तुओं से हमारा बाहरी जीवन तो सुखी हो सकता है,लेकिन हमारी आत्मा को सुख तभी मिलता है जब हम अध्यात्म से जुड़ते हैं।

अंतिम चरण में, मां ओशो प्रिया जी ने कहा कि ध्यान ही जिंदगी संवारने का सार-सूत्र है और धन तथा ध्यान- दोनों का सदुपयोग करके ही हमारा तन-मन-चेतन लयबद्ध हो सकता है। हमें भौतिक तल पर सुख, सुविधा, स्वास्थ्य एवं संपन्नता चाहिये। मानसिक तल पर विचारशीलता, चिंतन-मनन की क्षमता, आविष्कारक बुद्धि और विवेक चाहिये। भावनात्मक रूप से कला, सृजनशीलता, सदभावना, प्रेम, मित्रता, करुणा एवं अनुग्रहभाव तथा आत्मिक आयाम में ध्यान, समाधि, सुरति, सुमिरन और परम-मुक्ति चाहिये। मानव जीवन के उपरोक्त चारों आयाम जब तक समृद्ध न हों, तब तक कुछ न कुछ अधूरापन रहता है। उन्होंने अंतर्यात्रा ध्यान का अभ्यास कराया जिसमें लोगों ने बहुत दिलचस्पी ली।
इससे पहले,कार्यक्रम का प्रारम्भ रहस्यदर्शी,आध्यात्मिक गुरु ओशो के प्रवचनों से हुआ। मां जूही ने कार्यक्रम का सुंदर संचालन किया। प्रारम्भ में, उन्होंने नए साधकों के लिए ओशोधारा के समाधि और प्रज्ञा कार्यक्रमों का संक्षिप्त विवरण दिया ताकि उन्हें धर्मयात्रा के विविध आयामों की झलकी मिल सके। कार्यक्रम के दौरान वे दर्शन से भरी शेरो-शायरी का बेहतरीन समावेश करती रहीं। कार्यक्रम के आयोजक श्री एम.एल. मुटनेजा ने बताया कि सभागार में बड़ी संख्या में ऐसे लोग भी मौजूद थे जो पहली बार ओशोधारा के किसी कार्यक्रम में आए थे और उनमें से तीन सौ से ज्यादा लोगों ने माला-दीक्षा लेकर साधना-पथ पर चलने का संकल्प व्यक्त किया।
कार्यक्रम के दौरान तालकटोरा ऑडिटोरियम का विशाल कक्ष खचाखच भरा हुआ था। ओशोधारा के तीनों आचार्यों के दिल्ली में किसी कार्यक्रम के लिए आगमन लगभग दस वर्ष बाद हुआ था। इसलिए, आयोजन की जानकारी मिलने पर कई राज्यों से साधक दिल्ली आए थे। एक अन्य आयोजक ने कहा कि साधना के क्षेत्र में जितना व्यवस्थित प्रयोग ओशोधारा में हो रहा है, वैसा मानव जाति के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम के भव्य आयोजन में उन्हें दिल्ली के सभी ओशोधारा केंद्रों के संचालकों और  साधकों का भरपूर सहयोग मिला है और कार्यक्रम की सफलता सबके सामूहिक प्रयासों का ही परिणाम है।